कामाख्या तंत्र मंत्र साधना

 माँ कामाख्या देवी को  माँ सती की अंग स्वरूपा के रूप में भी जाना जाता है। कामाख्या देवी का उपासना स्थल  ‘कामुरु कामाख्या’ नामक स्थान पर स्थित है, इनकी उपासना इतनी प्रभावशाली होती है कि जो व्यक्ति कामाख्या देवी की पूजा करता है उसका कार्य या मनोकामना जरूर पूरी हो जाती है। कामरूप कामख्या में जो देवी का सिद्ध पीठ है वह सृष्ठीकर्त्री त्रिपुरसुन्दरी (दशमहाविद्याओ में प्रमुख मानी गई है) का है।  कामाख्या में जो आजकल प्रसिद्ध तांत्रिक विराजमान है उनका कहना है की विगत कुछ वर्षो में एक भी व्यक्ति तंत्र साधना के लिए नहीं आया है। ऐसी ही कुछ अनुभव दक्षिण भारत के प्रसिद्ध सह्याद्री पीठ के प्रमुख पुजारी जी का भी है, फिर भी न जाने बड़े-बड़े नगरो में बड़े-बड़े नामों की तख़्तियाँ लगाकर अपने आपको तांत्रिक घोषित करने वाले ये लोग आते कहाँ से हैं? सिद्ध तांत्रिक की पहचान यह होती है कि वह न तो किसी से कुछ लेता है , और न माँगता है, न संग्रह करता है, न मठ बनाता है और न ही लोगों के बीच में रहता है।

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 दृशा स्पर्शेन फुत्कारैरू पांगआगुष्ठेन बोधितैरू,


उदकेनाभिमन्त्रोनालुब्धश्च तनुते श्रियम।।


अर्थात जो व्यक्ति कोई भी तंत्र (महाविद्या) सिद्ध कर लेता है वह निर्लोभ होकर व्यथित को आंखों से देखकर, हाथ से स्पर्श कर, फूँक मारकर, पैर के अंगूठे से कुरेदकर या अभिमंत्रित जल देकर अपने शरणागत का कल्याण करने में सक्षम होता है।


माना जाता है कि भगवान शिव के तांडव तथा वियोग के परिणामस्वरूप 51 शक्ति पीठों की उत्पत्ति हुई थी। एक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने सती के शरीर को सुदर्शन से अंग भंग कर दिया था और सती के अंग जिस-जिस स्थान पर गिरे, वह शक्ति पीठ के नाम से जाने जाते हं।


माता सती की योनि कामुरु नामक स्थान पर गिरी थी जिसे आज कामाख्या देवीं के नाम से जाना जाता है, यह स्थान देवी के 51 शक्ति पीठों में सबसे शक्तिशाली पीठ माना जाता है।


ॐ‘‘जय माता कामाक्षा’’ ॐ


कामाख्या मंत्र और तंत्र


कामाख्या-मन्त्र का महत्त्व ‘कामाख्या तन्त्र’ के अनुसार ‘सिद्धि की हानि’ एवं


‘विघ्न-निवारण’ के लिए ‘कामाख्या-मन्त्र’ का जप करना चाहिए। यदि आप किसी समस्या से जूझ रहे हैं तो आपको ‘कामाख्या-मन्त्र की साधना’ अवश्य करनी चाहिए। यह ‘कामाख्या-मन्त्र’ कल्प-वृक्ष के समान है। इसकी साधना से सभी विघ्न दूर होते हैं और शीघ्र ही सकारात्मक फल प्राप्त होता है।


‘कामाख्या-मन्त्र’ का विनियोग, ऋष्यादि-न्यास, कर-न्यास, अंग -न्यास इस प्रकार से है-


।। विनियोग ।।


ॐ अस्य कामाख्या-मन्त्रस्य श्रीअक्षोभ्य


ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीकामाख्या देवता, सर्व-सिद्धि-प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः


कामाख्या तंत्र मंत्र साधना


कामाख्या देवी का ध्यान –


इस प्रकार से न्यासादि करने के पश्चात भगवती कामाख्या का ध्यान ऐसे करना चाहिए-


भगवती कामाख्या लाल वस्त्र-धारिणी, द्वि-भुजा, सिन्दूर-तिलक लगाए हैं। भगवती कामाख्या शीतल चाँद के समान उज्ज्वल एवं कमल के समान सुन्दर मुखवाली हैं। माँ कामाख्या स्वर्ण आदि के बने मणि-माणिक्य से जटित आभूषणों से शोभित हैं। भगवती कामाख्या विविध रत्नों से शोभित सिंहासन पर बैठी हुई हैं। भगवती कामाख्या के होंठों पर मधुर मुस्कान है। कृष्ण-वर्णा भगवती कामाख्या के विशाल नेत्र हैं। भगवती कामाख्या विद्याओं की स्वामिनी हैं। डाकिनी-योगिनी द्वारा शोभायमान हैं। सुन्दर स्त्रियों से विभूषित हैं। विविध सुगन्धों से सुवासित हैं। हाथों में ताम्बूल लिए नायिकाओं द्वारा सु-शोभिता हैं। भगवती कामाख्या समस्त सिंह-समूहों द्वारा वन्दिता हैं। भगवती के अमृत-मय वचनों को सुनने के लिए उत्सुका सरस्वती और लक्ष्मी से युक्ता देवी कामाख्या समस्त गुणों से सम्पन्ना, असीम दया-मयी एवं मङ्गल- रूपिणी हैं।


इस प्रकार से कामाख्या देवी का ध्यान कर पूजा करते हुए कामाख्या मन्त्र का ‘जप’ करना चाहिए। ‘जप’ के बाद निम्न प्रकार से ‘प्रार्थना’ करनी चाहिए।



अर्थात् हे कामाख्या देवि! कामना पूर्ण करनेवाली,कामना की अधिष्ठात्री, शिव


‘कामरु कामाख्या’ स्थान से कामाख्या सिन्दूर मिलता है, इस सिन्दूर से भूत प्रेत, वशीकरण, जादू टोना, गृह कलेश, व्यापर में अड़चन, प्रेम में समस्या, विवाह में परेशानी, व् अन्य समस्या का निवारण होता है, जो व्यक्ति इस सिन्दूर का प्रयोग करता है, उसपर माँ की कृपा सदैव बनी रहती है


कामाख्या सिन्दूर की इतनी महत्ता है कि इसका प्रयोग मांगलिक व् पूजा कार्यो में करने से व्यक्ति की मनोकामना अवश्य ही पूर्ण होती है।


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कामाख्या सिन्दूर पूजा करने की विधि-


जो जातक सिन्दूर का उपयोग करता है सर्व प्रथम उसके मन में माता के प्रति विश्वाश और आस्था होनी चाहिए, मन को शांत करके कामाख्या देवी पूजा विधि प्रारम्भ करनी चाहिए द्य जातक लाल रंग का वस्त्र धारण करके एक चाँदी के बर्तन या डिब्बी में सिन्दूर रख कर मंत्र का उच्चारण 108 करे


कामाख्याये वरदे देवी नीलपावर्ता वासिनी


त्व देवी जगत माता योनिमुद्रे नमोस्तुते


इसे शुक्रवार दिन से प्रारम्भ करना चाहिए और सात दिन तक करना चाहिए, सातवे दिन डिब्बे में सिन्दूर को निकल कर 11 या 7 बार मंत्र पढ़े यह सिन्दूर सिद्ध हो जायेगा। इस सिन्दूर को हथेली में लेकर गंगा जल ,केसर , चंदन पाउडर मिलाकर मंत्र का उच्चारण करते हुए माथे पर तिलक लगाने से सामने वाला व्यक्ति देखते ही वशीभूत होने लगेगा और वह आपसे आकर्षित हो जायेगा। इस मंत्र का प्रयोग स्त्री व पुरुष कोई भी कर सकता है।


कामाख्या सिन्दूर तिलक लगाने का मंत्र –


सत्य नाम, आदेश गुरु की। सत् गुरु, सत् कबीर।


विधि- आसाम के ‘काम-रुप कामाख्या, क्षेत्र में ‘कामीया-सिन्दूर’ पाया जाता है। इसे प्राप्त कर लगातार सात रविवार तक उक्त मन्त्र का 108 बार जप करें। इससे मन्त्र सिद्ध हो जाएगा। प्रयोग के समय ‘कामिया सिन्दूर’ पर 7 बार उक्त मन्त्र पढ़कर अपने माथे पर टीका लगाए। ‘टीका’ लगाकर जहाँ जाएँगे, सभी वशीभूत होंगे।

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